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Human Society

जय भारत जय विश्व 

समानता एवं अंतर में वही सम्बन्ध होता है ,जो एकता और विभिन्नता  मे है।  वस्तुतः सम और विषम का उदभव केन्द्र एक ही होता है।  जैसे रूप ,रंग ,आकार के रूप में मनुष्यों में  वाह्य  विभिन्नता दृटिगत होती है लेकिन फिर भी प्रत्येक जन स्वाश (साँस ) को भौतिक शरीर मे अनुभव करता है , जो एक है।  

सर्व उन्नति का आधार मात्र विज्ञान है।  विज्ञान अर्थात बृहद (विस्तृत ) + ज्ञान  और परीक्षण (प्रैक्टिकल ) का समिश्रण है , वह है विज्ञान। 

प्रत्येक मनुष्य वैज्ञानिक है।  मनुष्य प्रवृ त्ति  है , खोज करना /और कुछ और की चाह की        वृ त्ति ही प्रत्येक जन को विकास का पाथिक बनाता है।  सामान्य हो ,विशेष हो या अति विशेष जन  हो सभी विकासी है क्योंकि चाहते है ,करते है और पाते है विकास स्वयं का ,समाज का और जन -जन का।  

विश्व मानव समाज चाहे कितने ही देशों के रूप में , कितने ही धार्मिक विचारधारओं मे और असंख्य जातियों मे विभक्त है/हो तब भी प्रत्येक नागरिक /अनुयायी  और जाति वर्ग एक ही मानव समाज को प्रकट करता है।  जन /जन -जन द्वारा।  

सत्य सरल है।  

विश्व में उपलब्ध अनेकों -अनेक आध्यत्मिक धार्मिक विचारधरायें हिन्दु ,इस्लाम ,ईसाई ,सिख ,यहूदी ,बौद्ध ,जैन आदि कितने ही नामों  एवं धार्मिक कर्म -काण्ड ो और पूजा पद्धतियों के द्वारा वाह्य स्तर से विभिन्नता और भिन्नता को प्रदर्शित कर रहे  है फिर भी सभी धार्मिक विचारधारओं द्वारा एक मत से एक ही धर्म का बोध कराती है।                                                                                                   धर्म का अर्थ है , " मानसिक सच्चरितता"

धर्म सागर है और धार्मिक विचारधाएं वह नदियाँ है जिसके द्वारा मानव जीवन मे जीवन को पाने का माध्यम है।  किसी भी धार्मिक धारा की सार्थकता तभी है जो अपने अनुयायीओं को यह अनुभव और विश्वास करा सके की धर्म ही जोड़ता है। मै को मैं से , जन  से जन -जन को। 

क्रियायोग -विज्ञान 



देश का हाल 

भारत  देश की वर्तमान दशा चिंतनीय है।  कहते सब है हम भारतीय है , हैं भी लेकिन क्षेत्र सीमितता ,जातियता ,धार्मिक राग और स्वार्थता से नागरिक स्वयं को ग्रसित किये जा रहे है की अखंड भारत को क्षेत्रवाद से , जातियता से धार्मिक विचारधारा  के वशीभूत हो भारतीय समाज को खण्डित करने का प्रयासी बन।  भारत देश को विकसित और विघटित करने का कार्य विकास के नाम पर कर रहे है।                                                                                                                                           और दशा गंभीर हो रही है क्योंकि                                                भारतीय रानीतिक दल मात्र सत्ता और लोकप्रियता की लालसा के वास्ते इतने  लालयित है और भाषणों द्वारा यही भारतीय जनों के समक्ष दर्शाने  का प्रयास किये जा रहे है की  पार्टी ही मात्र विकास चाहती है।                                                                                                          भारतीय समाज में व्याप्त और विस्तारित  हो  है विघटन को जिसका आधार क्षेत्रवाद , जातियात ,धार्मिक विचारधारओं से स्फुटित  है / और हो रहा है।  भारतीय राजनीतिक दल  इन विघटनों को समाज से मिटाने को संकल्पित होने के बजाय राजनीतिज्ञ गंभीरता से गणना करने मे वयस्त है कि इन सामाजिक  विघटनों का फायदा किस प्रकार  प्राप्त   किया जाए की अधिकतम मतों को कर बहुमत के साथ सत्ता की प्राप्ति की जाये  और सत्ता सुख से लाभित हो सके और होते रहे।  

जागो जन और विचार करें।  हम सब इस बात से सदैव गर्वित है कि हम उस देश के वासी है , जिसने मानव जाति के लिए अमरता प्राप्ति का वह पथ का सृजन किया जिसका आधार विज्ञान है। 

श्रद्धेय श्री योगी श्री गुरु  कथन 

क्रियायोग -विज्ञान का प्रसार + भारतवर्ष का विस्तार 

क्रियायोग -विज्ञान का प्रसार-   +  -भारतवर्ष का विस्तार  

क्रियायोगविज्ञान का प्रसार-   +  -भारतवर्ष का विस्तार 

                    क्रियायोग -विज्ञान का प्रसार-   +  -भारतवर्ष का विस्तार   क्रियायोग -विज्ञान का प्रसार +  भारतवर्ष का विस्तार 
                                                        

                                यह बात प्रत्येक के वास्ते विचारनीय है की भारतीय  संसद की वर्तमान लोकसभा स्पीकर आदरणीय श्रीमती सुमित्रा  महाजन के द्वारा 

 भारत।  भारत जोड़ो आंदोलन के सम्बन्ध को जन -जन से जोड़ने का अदभुत विचार को आंदोलन का रूप देना ही वास्तविकता को इस प्रकार प्रकट करेगा की सभी जन वास्तविक राजनीति ही कर पाए। 


जन - जन के जुड़ने से बनता है , " जन समूह " 

जन समूहों के मिलने से दिखती है , "जनता "

भारत की जनता एक है यही भारत जन की आवाज है।  

जनता एक है चाहे जिस देश की भारत , चीन , अमेरिका ,रूस और सब।  

  

गलत -सही का अहसास और सुधार करना ही सुधार का प्रयास है।  

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